Thursday, June 23, 2011

अभिलाषा .....

मंदिर में 
पूजा करते हुए 
उसे लगा 
मानो
भगवान नें 
उसकी इच्छा पूरी कर दी है ,
पकड़ लिया था
उसका हाथ 
एक कड़े से हाथ ने 
पर , मालूम हुआ 
वह तो , एक चोर था ,
जो चुरा ले गया था 
उसके हाथ का कंगन !!
- डॉ. मुकेश राघव 
 

3 comments:

श्रीमती मधुलिका मीणा said...

डॉ. मुकेश राघव जी , आपका काव्य संकलन देखा , पढ़ा . रचनाएँ काफी अच्छी हैं . एक व्यक्तिगत सवाल , क्या आपने साहित्य के क्षेत्र में कोई उपाधि प्राप्त कर राखी है ?? पेशे से आप इलाज करने वाले हैं या फिर पी.एच .डी. की उपाधि से अलंक्र्त हैं . कृपया अन्यथा न लें .

डॉ. ललिता कौशिक said...

डॉ. मुकेश राघव , रचना संसार के मोतिओं में , एक छुपा हुआ , कवि प्रकट हो गया . स्वागत है. रचनाएँ काफी सुंदर और साम्विक विषयों पर है , जिसे हर भावुक पाठक को पढना , पाठक के लिए उपयोगी सिद्ध होगी .
धन्यवाद

श्रीमती नेहा गोयल said...

डॉ. मुकेश जी , क्या बात है ? समस्त कविताएँ , सामयिक विषयों पर , मार्मिक और चित्र मय प्रस्तुति लगातार बार बार . रचनाओं का संकलन काफी अच्छा है.
धन्यवाद