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Saturday, July 9, 2016

प्रिय हेतिका राघव के नाम दादू का एक पत्र

प्रिय हेतिका राघव
सदा खुश रहो 
एक पत्र तुम्हें
अपने दादू  की और से
तुम कितनी खुश नसीब  हो कि
बड़े दादा श्री पदम् सिंह राघव और बड़ी दादी श्रीमती सुदर्शन राघव
का
आशीर्वाद तुम्हारे सिर पर हमेशां बना रहेगा
बेटा तुम्हें स्वाभिमान एवं अभिमान होना चाहिये
कि
तुम्हें सन्नी जैसा पापा मिला और मनीषा जैसी मम्मा
कितना प्यार करतें हैं सब
तुम्हारी दादी ललिता राघव का प्रतिबिम्ब बनना
सब रास्ते अपने आप मंज़िल तक पहुंचा देंगे
और
पता  है
तुम्हे सबसे ज्यादा प्यार कौन करता है
वह है
तुम्हारी प्यारी सी भुआ नेहा राघव
भुआ  कितनी अच्छी है कि,
हर पल
 मैं
नेहा
और छुटकी अरे नहीं हेतिका
को
सन्नी और मनीषा से ज्यादा प्यार करता हूँ
भगवान तुम्हें और तुम्हारे मम्मी पापा और  भुआ
को
खुश स्वस्थ और सानन्द रखे
ढेर सारे प्यार के साथ
खुश रहो 
तुम्हारा 
दादू

Sunday, August 7, 2011

रिश्तों के फ़र्ज़ को ठुकराना ..क्या कितना आसान है ??

खून के 
रिश्तों के जंजाल में , 
दिल को लगा कर
क्या भूल पाना आसान है ??
जिन्दा रहकर , रिश्तों के फ़र्ज़ को ठुकराना ,
क्या इतना आसान है ??
जिन्दा रहकर 
क्या चमड़ी उत्तारना आसान है ??
जिन्दा रहकर ,
क्या मौत को बुलाना आसान है ??
क्या ?? 
कुछ भी नहीं 
पर 
दिल को जलाना तो आसान है  .
- डॉ. मुकेश राघव 

Sunday, July 24, 2011

ईश्वर दरिंदों को अपने आप फल देगा .....

तुम्हें जनम से अब तक
किसी ने पहचाना तो वोह है ,तुम्हारा  
ईश्वर  
भोला भाला चेहरा लिए
साधारण और सभ्य , भारतीय संस्कृति कूट कूट कर भरी है .
तुम में
और आज इन दरिंदों के बीच , तुम इतने समय घुट घुट कर जीती रहीं .
आदर्श का परिचय दिया !
पर तुम स्वछन्द और आधुनिक विचारों की न बन सकी.
घर की इज्जत की खातिर , बातों को  दहलीज़ भी पार  न करने दी .
अब भी देर नहीं बेटी , ईश्वर दरिंदों को अपने आप फल देगा
या
फिर किसी को निमित बना दरिंदों का नाश तो कर ही देगा .
डर , किसका ?? समाज का !!
कहाँ है यह समाज ?
जो औरत को जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर करता हो !!
धिक्कार है , इस समाज को और उसके मुखोटे बदलते दरिन्दे !!
- डॉ. मुकेश राघव

Tuesday, July 5, 2011

सब चाहेंगे , लड़कियां , लड़के नहीं ..!!!!

सब कहते हैं ,
जब तूं पैदा हूई थी .
कितने रोये थे , पापा 
पांचवी लडकी जो पैदा हो गई थी .
सब के चेहरे मुरझा गए थे ,  

किसी ने मिठाई मांगने की कोशिश तक भी ना की थी .
सब मूंह लटगाये खड़े थे , मानो हो गया हो घौर अन्याय ,
कितना कातिल है , यह संसार 
लड़कों को सब चाहतें हैं , पर लड़कियों को कोई नहीं 
पर मैं दिखला दूंगी 
दुनिया को चमत्कार 
और परम्परा को हटा दूंगी ,
की 
सब चाहेंगे , लड़कियां , लड़के नहीं ..!!!!
- डॉ. मुकेश राघव 

Thursday, June 30, 2011

आज , एक चवन्नी का अंत हो गया ..!!

दुनियाँ के चौराहे पर , पड़ी 
एक चवन्नी , उठा ली .
देखता हूँ , इस दुनिया के थपेड़ों  से , वह भी 
घिस गयी थी .
उस पर मुद्रित प्राक्र्तीक सोन्दर्य , दामन छुड़ाने लगा था , 
बस , चिकनी मिट्टी ने उस पर पड़े , खड्डों को भर रखा था .
मैंने उसे साफ किया 
पर 
यह , क्या ...???
आज 
एक चवन्नी का अंत हो गया 
चलन बंद हो गया .
- डॉ. मुकेश राघव 

Monday, June 27, 2011

कल अपना भी यही समां होगा

मंद मंद बह रही थी , पुरवाई
महकते फूल , कलियाँ इठलाई 
हर तरफ , ख़ुशी का आलम था .
कोशों दूर तक थी , उनसे तन्हाई 
पर अचानक 
एक झोंका हवा का जो आया 
गिर गए चंद पात , शाखों से .
देखकर , उनका यह गमें मंज़र 
चीख उठे तमाम नवपल्लव 
चू पड़े थे , अश्क आँखों से 
कि
कल अपना भी यही समां होगा .
- डॉ. मुकेश राघव 

Sunday, June 26, 2011

एक श्रधान्जली ....

आपको 
क्या अधिकार था ??.... कि 
बिन मुझ से पूछे , चली आंईं 
मेरे जीवन में स्नेह कि ज्वाला जलाने
बिजली कि तरह 
और 
बिन पूछें , अचानक ही चली गयीं 
इतनी दूर ...!!!
मेरा 
जीवन में उत्साह भर , कर 
अकेला 
बेसहारा 
जिंदगी भर , पछताने  को .
- डॉ. मुकेश राघव 

Friday, June 24, 2011

शरीर पंचतत्व में विलीन हो रहा है ......

क्या कहा !!
वो नहीं रहीं ...??
पर , आप में तो 
जीने की तम्मना कूट कूट कर भरी थी .
जीवन में संघर्ष करते हुए ,
अभी अभी आप का शरीर पंचतत्व में   विलीन हो रहा है .
शरीर नहीं होगा , मुझे मालूम है .
पर 
ऐसे अवसर पर , मैं  आप को नहीं देख सकता .
काफी कमजोर दिल है , मेरा 
शायद , आप से जुडाव  या मेरी आप से जुडी भावनाएं .
...............!!!!!
जहाँ  भी होंगी ,
हमें आशीर्वाद दे , रहीं होंगी .
एक कटु सत्य , मगर बहुत कडुवा .
कितना अनुशासनात्मक  जीवन ,   सादा जीवन ,
हाँ , विचार कुछ अजीब और विचित्र , अब सब कँहा गया ....??
बस , एक यादगार बन कर रह गया .....!!
अश्रुपूरित धारा , अनवरत बह रही है .
दिल दुखी है , दिमाग संयत नहीं है .,
फिर भी ... लेखनी चल रही है .
आप कहाँ गईं हैं ?? मुझे मालूम है .
आप के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुले हैं .
- डॉ. मुकेश राघव  

Thursday, June 23, 2011

अभिलाषा .....

मंदिर में 
पूजा करते हुए 
उसे लगा 
मानो
भगवान नें 
उसकी इच्छा पूरी कर दी है ,
पकड़ लिया था
उसका हाथ 
एक कड़े से हाथ ने 
पर , मालूम हुआ 
वह तो , एक चोर था ,
जो चुरा ले गया था 
उसके हाथ का कंगन !!
- डॉ. मुकेश राघव 
 

Sunday, June 19, 2011

मैं रद्दी खरीदता हूँ .??

मैं 
रद्दी खरीदता हूँ .............???

जिनको लोग फेंकते हैं 
उन्हें मैं , प्यार से रखता हूँ .
क्योंकि मुझे पता है ,
दुनिया की नज़र में  फेंकी हुई वस्तुएं
या  
दुनियाँ की नज़र से फेंके हुए लोग ??
एक दिन , 
कालचक्र के फेर में
समाज / मशीन ...! !
में 
घुसकर / मिलजुल कर ,
फिर नए हो   जायेंगे .
- डॉ. मुकेश राघव 

Saturday, June 18, 2011

एक विडम्बना ..???

फूल......
      गुलाब का हो या बोगनविलिया का
      गेंदे का हो या पीटूनिया का 
      मुरझाया हुआ , देखा नहीं जाता .
सिक्का ...........
     पांच का हो या दस का
     सड़क पर पड़ा ,
     लोगों के पैरों में आत्ता
     देखा नहीं जाता .
देख सकता हूँ , किसी को हंसते हुए
रोना देखा नहीं जाता , 
देख सकता हूँ , किसी को मिलते हुए
बिछड़ते हुए    देखा नहीं जाता !!
- डॉ. मुकेश राघव

Monday, June 13, 2011

मौत इतनी हसीन होती है .......! !

मेरी जिन्दगी में , दो मिनट को भी 
कोई मेरे पास नहीं बैठा था .
आज सब मेरे पास बैठे थे ,
अपने और गैर दोनों ही 
दोस्त और दुश्मन दोनों ही थे 
पूरा मोहल्ला ही एकत्रत हो गया था .
आज तक मुझे , कोई तोफा न मिला 
था , 
पर तरस आ रहा है , उस हाथ पर , जिसने मुझे कपड़ों से धका था.
मैं , आज मालाओं से लादा जा रहा था ...
जैसे दुनिया का रूप ही बदल गया था 
एक वक्त , दो कदम भी साथ 
चलने को तैयार न होता था , कोई 
पर , आज तो काफिला बन कर 
मुझे कन्धों पर उठाए हुए , चले जा रहे थे ...
आज पता चला , मौत इतनी हसीन होती है .
कम्बक्ख्त , हम तो यों , ही जिए जा रहे थे ??? 
                                                       - डॉ. मुकेश राघव

Friday, June 10, 2011

विशाल ...... पर , कड़वा ???

नदी भी
कितना रोती थी ,
अपना अतीत याद कर ,
कभी तो , उसके
शीतल , मीठे
जल को
सब पीते थे
चाव से !
पर .......
आज इस समुद्र में
मिलने पर , पीना तो दूर
" कुरला " तक करना पसंद नहीं करते
सच ही तो है
समुद्र समान
विशाल , पर अंतर्मन इतना  कड़वा !!
क्यों इतने कडवे होते हैं ,
ये  , अपने को बड़े समझने वाले लोग ??
- डॉ. मुकेश राघव

Wednesday, June 8, 2011

कितना नासमझ है , ये मानव मन

कितना
भोला , समझता है , इन्सान
ईश्वर को
एक खिलौना
समझते हैं  लोग ईश्वर को,
कि
माफ कर देगा .
वह लाखों पाप ,
अत्याचार
और
अन्याय , मात्र एक बार , उसकी आराधना करने से
पर शायद नहीं.
ईश्वर कभी न 
बक्शेगा  उन्हें ,
बस
हंस कर कह देगा
अरे इन्सान !! 
पहले मेरी परीक्षा में पास तो  हो जा
और मन ही मन बुदबुदयेगा
कितना नासमझ है  ये मानव मन और उतना ही  कमजोर .
 मेरी परीक्षा में तो कोई फेल नहीं होता !!!!
                                                     -डॉ. मुकेश राघव

Tuesday, June 7, 2011

खरीददार का इंतजार

हम सभी  ,
घडिओं की दुकान
पर पड़ी
बंद घडिओं के समान  हैं .
जिन्हें इंतजार है,
एक खरीददार का ,
जो हमें चला सके.,
और
तत्पश्चात,
हम
उसे चला सकें .

- डॉ. मुकेश राघव

Saturday, June 4, 2011

क्यों हँसतें हैं , लोग ...किसी के गिर जाने पर !!

पता नहीं , क्यों हँसतें हैं , लोग
किसी के गिर जाने पर !!
शायद ,
उसके गिरने पर हो आता हो ....
अपने ऊँचा  होने का अहसास इसीलिए 
शायद
गिरे हुओं की  मदद , करने का कहाँ था ???
समय , उनके पास .
अभी यही सोचता जा रहा था
कि
सीडिओं से गिर पड़ा ...
सकबका सा गया था मैं ??
गिरते गिरते नीचे पहुंचा , तो देखा ....
हंस रहे थे , सब
मेरी नादानी पर !!!
- डॉ. मुकेश राघव

Thursday, June 2, 2011

नाम ... का जुडाव केवल राख से.......????

चंद्रमा के समान
नाम  के भी चारों और ,
घूम रहे थे , सितारे
क्रमश:
कुमार , स्कूल में
मिस्टर ,  कॉलेज में
श्री , यहाँ ऑफिस में
और
फिर नाम रूपी चंद्रमा
के
ढलने पर , यकायक              
स्वर्गीय ...!!!
कैसी है , यह विडम्बना फिर भी चंद्रमा घिरा था ,
तारों से
और
नाम केवल राख से.......????
- डॉ. मुकेश राघव  

Monday, May 30, 2011

कितना स्वार्थी हूँ , मैं..........??????

मौत से भी न डरा था
मैं , उस इंसान को बचाने के लिए
 पर
स्वर्ग में बैठा , सोच रहा हूँ , बड़े दुखी मन से
कि , जिसके लिए जान हथेली पर रख
मौत से खेला था , मैं
उसने , मेरी लाश पर
स्वंय आकर .......
माला डालने की इच्छा 
प्रकट
तक नहीं की !!!!
बस कुछ सुमन के टुकड़े
किसी के साथ , भिजवा कर
मेरी  लाश पर डलवा दिए थे ...
क्या मैंने , इंसानियत के लिए किये
कार्य को.......... 
स्वार्थवश किया था ???
नहीं ...
तो क्यों सोच रहाँ हूँ , मैं
लगता है , कितना स्वार्थी हूँ , मैं
- डॉ. मुकेश राघव

Saturday, May 28, 2011

मेरे पाँव ही गलत थे .....

मैंने तुमसे
क्या पाया ??
पाने की ईच्छा ना होते हुए भी ,
पाया ........
प्यार ,
आशीर्वाद ,
और
मन की शांति
मैं समझता था कि तुम हो मेरे पास  ,
फिर
यह उतार चढाव भरा
जीवन क्यों दिया .....??
और 
उसके  के बाद
मुझे गहरे कुँए में
क्यों  गिरा दिया..!!
दोष किसे दूं .....
मेरे पाँव ही गलत थे ...!!!!
- डॉ. मुकेश राघव

Friday, May 27, 2011

अतीत के घेरे .......

आज अचानक , अपने आँगन में
शैशव का यूँ , देख मचलना
झूम उठा ,  मेरा भी अंतर्मन
मानो
लौटा हो , फिर से बचपन !!
वही मचलना .. वही रूठना
इस नन्ही चाहत में
पल में हँसना , पल में रोना
मनमोहक अंदाज़ लिए
एक पल को लगा .....??
काश !! वक़्त थम जाये 
और...........
मैं  उन्मुक्त निश्छल ठहाके लगा सकूं
अवाक् सा
वर्षों  पीछे लड़कपन में 
इतना खोया हुआ
था ,  खिलखिला के हंस पड़ा , इस दुनियां से दूर
चन्द मुक्त सांसें ले सका .
बस तभी एक नारी स्वर  आया .........
 " अरे , सब्जी तो लेते आना ! "
क्या अजीब  था , वह बचपन.
कितना हसीन था वह बचपन ...!!!!!

- : डॉ. मुकेश राघव


Thursday, May 26, 2011

कहाँ है , वो इंसानी दरिंदा ...... ????

वह जा रही थी ,
निरुद्वेश्य ,
नि:सहाय सी
चित्र लिखी , निवस्त्र  सी ,
समाज की नज़र में
पागल जो थी..... ??
आँचल से नवजात शिशु चिपकाये ,
ममत्व की भावनाओं से ओतप्रोत !!!
पागल जो थी..... ??
एक पुरुष स्वर सुना ....
" क्या संभालेगी इसे ?? "
ठीक ही कहा होगा !!
क्योंकि वह स्वर , एक पुरुष का जो , था .
वह मन ही मन कुछ बोलता चला जा  रहा था ,
ख़ैर ...............
उस अबला को अपनी ही सुध नहीं थी
क्योंकि वह पागल थी .....??
पर
उसे क्या कहें , जिसके पागलपन के  नतीजे 
का  यह फल था.... ,
एक नवजात शिशु !!!
विडम्बंना..... ??? 
कहाँ है  , वो इंसानी दरिंदा ...... एक पुरुष !!
वो समाज और उसके ठेकेदार , कहाँ हैं .....? 
सब कुछ गौण है ...?
मात्र तमाशबीन
 बस
सब अपनी अपनी रोटीआं , सेक रहें हैं
बेबश तो मात्र है  , एक नवजात शिशु
और
इस संसार में ममत्व लिए ,
एक पागल नारी ...!!!       
क्या है कोई जवाब
कोई
मंच , जिसके पास हो इसका
समाधान
नहीं , तो
धिक्कार
है
हम सब का जीवन ..........

   : डॉ. मुकेश राघव








Wednesday, May 25, 2011

पत्तझढ़.............!!!!!!!!!

नए नए रिश्ते
खिलतें हैं ,
फलते फूलते हैं ,
 
और ,
यकायक
सूखे पत्तों की तरह
टूट जातें हैं ......
इन गहराहियों में,
जिनके भीतर
देख सकने की
हिम्मत
और
शायद ..................................................  क्या ??
यथार्थ में ,
हम से
समय ने छीन ली है .- डॉ. मुकेश राघव

Sunday, May 22, 2011

मानव की सेवा.......

मानव  सेवा के लिए तत्पर
जब भी पुकारो , चले आते हो
                  याद है ,
     हम तुम, दोनों साथ साथ थे
      मैंने तुम्हें, उस मानव की सेवा के लिए
                  कहा था .
तुमने साफ इंकार कर दिया था ?
पर क्यों .... 
       क्योंकि.......??????
        वह अपाहिज था ?
         नहीं ??
       तब  समझ आया ,
       जब तुम्हीं  ने कारन बतलाया ,
       अवश्य वह गलत था
               और
        तुम सही , संस्कारी थे !!
इसी तरह चलते रहो , तुम अमित हो
पर फिर  इस व्यक्ति  को समझाने ,
मैं गया था ............
और जवाब मिला था , ....तुम्हें मतलब ??
मैं अवाक् सा रह गया था ,
कि हवन में भी हाथ जलते हैं !!!
        क्या मदद करना अपराध  है ,

 शराब ना पियें !!

शायद , इंसान की फितरत  ही खराब है .
पर ,
फिर भी मैं अनवरत करता रहूँगा ,
सेवा मानव की .......
: डॉ. मुकेश राघव  


                        
                

Saturday, May 21, 2011

कमल सपरा जी का आशीर्वाद

संस्कारों की सोंधी गंध
बिखेरते तुम मन भावन हो
गंगा की धारा को  छूते
पवन झकोरे पावन हो ,
      पर पीढ़ा के संवेदन की
       स्याही में रचते हो गाथा
      गैरों से उतना ही बंधन
       जितना अपनों से  है  नाता
केवल मानव मूल्य भरें हैं
शब्द कोष की रचना में
श्रधा और विस्वाश बसें हैं  
मधुर तुम्हारी  रचना में
       ऐसे मानव विरल हैं , होते
       शिशु सम हृदय सरल हैं ,  होते
यह पहचान किसी पूर्व जनम की
हुई मूर्त पुनः इसी जनम में      
 माटी का तन माटी में मिल जायेगा
       मरू भूमि में चिन्हों सा मिट जायेगा
        शेष रहेंगी , मन को भिगोती , बरखा के
पहले बादल की जीवंत स्म्रतियाँ   ................
      
DR. MUKESH RAGHAV

ASSOCIATE PROFESSOR,
OBSTETRICS AND GYNAECOLOGY
S.P. MEDICAL COLLEGE
BIKANER:334003
email: drmraghav@gmail.com